Wednesday, July 31, 2013

बारिश में भीगा है जिस्म मगर 
आँखों का पानी है, कहता कुछ और 
अभी बरसने है, बाकी कुछ सावन 
अभी यु सुखा, पड़ा मन का आंगन 

ठेहरी नहीं बूंदे, कोरी हथेली पर 
अभी ज़ुल्फ़ से पानी, छटना है बाकी 
अभी खुलके बरसा, नहीं कोई बादल 
अभी यादों से दिल का कटना है बाकी 

ज़मीं के कलेजे पे, पैरो से छब छब 
हाथों से बारिश का तन चूमलू 
उस ज़ालिम के जैसे, जो बरसे ये पानी 
बिसरे हुए लम्हों में,मैं फिर झुम्लू 

गुज़रती हें बूंदे, जब होकर के मुझसे 
लगता है जैसे, वो छुकर गया 
बहता है मुझमे, वोह बनकर लहू 
आदत मेरी वो, ये क्यों कर गया 

Saturday, July 27, 2013

तकदीर

या न थी मुक्कमिल,
           लकीरों में ख्वाहिशें 
या शायद रज़ामंद,
          न रहा वो ख़ुदा 

वर्ना तो कोशिशे,
          हमने भी लाख की,
तकदीर, के मिलकर भी 
          वो हो गया जुदा 
 

Wednesday, July 24, 2013

यु न दौड़ ज़िन्दगी

धीमी कर रफ़्तार ज़रा 
युही, न दौड़ ज़िन्दगी 
अभी तो करना, बाकि रहा 
काफी और ज़िन्दगी 

खुलके अभी तक जीया ही नहीं 
मर्जी से साँसों को लिया ही नहीं 
औरो के लिए ही, है दम भरा 
खुदके लिए है, बहोत कम करा 
होना है बाकि, अभी बेफ़िकर
बटोरने-ख्वाब, जो गए है बिखर 
            वक़्त की न ऐसे, लगा बंदिशे 
            न कर इस कदर, तू ज़ोर ज़िन्दगी 
            अभी तो करना बाकि रहा 
            काफी और ज़िन्दगी

अभी तो बाकी निखरना रहा 
बा-तमन्ना और संवरना रहा 
ख्वाहिशों को होना है, कुछ मनचली 
अरमानो को अब तक, ज़बाँ न मिली 
पुराने ज़ख़्म है, अभी तक हरे 
शिकवो के कितने, ख़ज़ाने भरे 
              दे परवानगी, की सुलझाऊ इन्हें 
              जल्दबाज़ी मे, न मरोड़ ज़िंदगी 
              अभी तो करना बाकि रहा 
              काफी और ज़िन्दगी

अपनों से टूटी जो, कडिया न जोड़ी 
पागलपन की कोई, सीमा न तोड़ी 
मस्तियों की पिटारी, कही खो रखी 
सालों से दोस्तों की, डांट न चखी 
खेल कर खुद को, थकाया नहीं 
कुछ समय से खुदको, आज़माया नहीं 
              जी भर के करलू, मनमानिया 
              दे  इज़ाज़त, कुछ और ज़िन्दगी 
              अभी तो करना बाकि रहा
             काफी और ज़िन्दगी

जवानी को दामन में, छुपाये रखा 
अटखेलियो से भी, बचाए रखा 
सब कहते गए, हम करते गए 
मूँद आँखें, हर कदम, बढ़ते गए 
'हीर' बन हवाओं में उड़ना रह गया
मनचाहे 'रांझे' से जुड़ना रह गया 
             बन तितली, मैं फिरसे उडाने भरूँ
             बदल तरीके, कुछ तौर ज़िन्दगी 
             अभी तो करना बाकि रहा
             काफी और ज़िन्दगी

अभी उसको बाकी, बताना भी है 
शिक्वें और प्यार, जताना भी है 
कुछ नखरे, कुछ हाम़ी, दिल की बातें हैं बाकी 
कुछ खुली, कुछ छुपी, मुलाकातें हैं बाकी 
पूरी है करनी, कई फरमाइशें
बाकी है उसकी, आज़माइशें
            बाँहों मैं उसकी, सिमट जाएँ हम 
            लम्हों को ऐसे, कुछ जोड़ ज़िन्दगी 
            अभी तो करना बाकि रहा
            काफी और ज़िन्दगी

उसके साथ, थामे हाथ, ढलती शाम   
कभी टेहेलना, कभी दो जाम 
उसके काँधे, रखकर सर, आंखें नम 
कभी रफ़्तार, कभी बस थम 
बाकी है उसे, अभी और सताना 
बाकी है उसे, अभी गले लगाना 
            लग जायें गले, जी भर के हम 
            कुछ देर अकेला, हमें छोड़ ज़िन्दगी 
            अभी तो करना बाकि रहा
            काफी और ज़िन्दगी

बैठ ऊँची ईमारत पर, हवां में पैर हिलाते हुए
ज़मीं पर लेटे हुए, नभ से नज़र मिलाते हुए 
समंदर की लहरों पर, साथ कदम बढ़ाते हुए 
देखना है संग उसके, खुदको मुस्कुराते हुए 
कुछ रात-ओ-दिन, कुछ शाम-ओ-सहर, ऐसे हो 
मेरे ख्वाब, मेरे ख्याल, मेरी चाहत जैसे हो 
              फिर चाहे आग़ोश में उसके, तोड्लू मैं दम 
              ले आ ऐसा अब कोई, मोड़ ज़िन्दगी 
              अभी तो करना बाकि रहा
              काफी और ज़िन्दगी

यु न खेल, आंख मिचोली 
न हाथ, छोड़ जिन्दगी 
ऐसे भी न तोड़ दिल ये 
न साथ, छोड़ ज़िन्दगी 
धीमी कर रफ़्तार ज़रा
यु न दौड़ ज़िन्दगी
अभी तो करना बाकि रहा
काफी और ज़िन्दगी

Friday, July 19, 2013

काश

झूठी  उसकी चाहत पर, इतराते रहे
सच होते एहसास 
तो क्या कर जाते हम ..........

उसकी बे-परवाही पर भी, प्यार आता है
प्यार कर लेता वो
तो मर ही जाते हम.............  

Thursday, July 18, 2013

किस्सा तेरी बातों का

नया सा कुछ नहीं 
फिर वही ले आये हैं 
बुरा न मानो जानेमन 
किस्सा तेरी बातों का 

शाम ढले तारो तले 
हलकी आँखें मूंदकर 
सो बार होठों से लिया 
स्पर्श तेरे हाथों का 

धडकनों पर कान धरे 
रूह से तेरी मिल लिए 
वो मिलन भी हिस्सा रहा 
तुझसे मिली सौगातों का 

ये क्या लिखकर लाये हो 
गिनती दिन दिन मिलने की 
क्या हिसाब कर पाए तुम 
तनहा रुदलती रातों का 

मुट्ठी मेरी खोल कर 
क्यों लकीरें ढूंढते हो 
रंग अभी उतरा नहीं 
प्यार की बरसातों का 

मत्थ्हे मेरे चढ़ गए 
जुगनू है बीतें कलके 
दिल मैं मेरे रोशन रखते 
दिया तेरे जस्बातों का 

जाना था, तू चला गया 
शायद यूँही होना था 
पर समय दोहराता रहा 
मर्म हसीं मुलाकातों का 

मुझसे जो ले जा सको 
'जाना' अबके ले जाना 
और नहीं थामा जाता 
समंदर तेरी यादों का 

मौका चाहे कोई हो 
चाहे कोई दस्तूर 
हर जगह ले आतें हैं 
किस्सा तेरी बातों का 
बुरा न मनो जानेमन 
बस किस्सा तेरी बातों का 

Monday, July 8, 2013

पहोंच से अपनी दूर है

हाथों से क्या पलटे जायें 
वक़्त ने जो फेकें पाशे 
कदमो से ही नाप ले आ 
वो मंजिल कितनी दूर है 

 किन आँखों में ख़ाब नहीं 
किसका दिल ख़ाली घड़ा 
कुछ दम भरके निकल गए 
जो बिखर गए, मजबूर है 

ख्वाहिशों की होड क्या 
बे-लगाम वो घोड़े है 
थमते तब, जब सांस रुके 
बेइन्ताहि सा फ़तुर है 

चिलम से बढ़कर चराग़ भी 
हल्ला मचा है सिने में 
ख्याल भी ऐसे आग लगा दे 
तपीश कुछ उसमे ज़रूर हैं 

नज़र ने लेकर दिल में रखा 
दिल का हाल बेहाल है
इसमें उसकी क्या खता 
नजरो का ही कसूर है 

बेपरवाही कडवी इतनी 
मिसरी भी मुहं में ज़ेहर लगे 
लबों से उसके पीतें है हम 
उसके रस में चूर है 

युही नहीं तारीफें होती 
कहतें हमें हसीन लोग 
छा जाता इन आँखों में  जो 
उसके स्पर्श का नूर है 

गद गद ख्वाइश हो उठती है 
सीने से उसके लग जाए 
खो भी देते खुदको उसमे 
पहोंच से अपनी दूर है 
 

Sunday, July 7, 2013

बातों मे निकली बात

बातों मे निकली बात
और एक बात आ गयी
अठरा बरस पुरानी
एक याद आ गयी
अभी तो जवाँ हुआ न था
और ये किस्सा हो गया
एक अन्जाना  चेहरा
दिल का हिस्सा हो गया
यु अचानक एक दिन
वो कहीं से आ गयी
न कोइ था भाया  इतना
वो जितनी भा गयी
साँठ मिनट के साथ में
ये कमाल हो गया
उसने देखा भी नहीं
मेरा बुरा हाल हो गया
जाते हुए वो अदब से
ऐसी उलझन दे गयी
सँवर के बिखर गया मैं
मानो जान ही ले गयी
होंसलो ने कदम बढ़ाये नहीं
कभी ज़िकर कर पाए नहीं
दूरियाँ युही बढती रही
चाहत पर मिटटी चढती रही
रिश्तों के भँवर में उलझता गया
हर खाब मेरा झुलसता गया
दिन बने महीने
महीनो में बीतें साल
ज़िन्दगी ने हर मोड़ पर
बदली अपनी चाल
देखा नहीं इक अरसा उसे
न किया कभी इकरार
कह ही नहीं पाया कभी
उससे हुआ था प्यार
सदियों से लम्बी राहों पर
दोनों ही कहीं खो गए
अपने बनाये घरोंदो में
दोनों मशरूफ़ हो गए
मिली कहीं एक बार मुझे
वो अनजान मेरे प्यार से
खुशी में बदला ग़म मेरा
मिला था जो हार से
ये ख़ुशी इस बात की थी
वो बेहद खुशहाल थी
में भी आगे निकल चला था
ज़िन्दगी यहाँ भी निहाल थी
दोस्त बने हम-दोस्त रहे हम
फिर कुछ साल निकल गए
जाने क्यों देख दोबारा उसे
अब जस्बात मेरे मचल गए
इक तमन्ना फिर जागी
काश के ऐसा यार हो
वो मिले न मिले, ग़म नहीं
कमस्कम इकरार हो
उसे पानेकी चाहत
न थी न कभी होगी
ख्वाइश-की इक बार सही
उसे भी हमसे प्यार हो

Thursday, July 4, 2013

औरों का ग़म देखा

औरों का ग़म देखा 
            लगा की अपना कम है 
                       मोहबत्त के सिवा दुनिया में 
                                   'आशिक़ ' और भी ग़म है 

Monday, April 8, 2013

वो मिला, नज़रें मिली 
और गुज़र गया अजनबी सा 
हँसी भी आयी , आंसू भी 
क्या वो मेरा अपना था 

दर्द उठा, कसक हुई 
फिर वही, कश्म्कश हुई 
काश छूकर, देख लेती 
हकीकत, या कोई सपना था 

साँसों की ही, दूरी रही 
जाने क्या, मज़बूरी रही 
दुश्मन भी जो, बन न सका 
जाँ से अज़ीज़, वो वरना था 

चाहत मगर, दूर रह न सकी 
उसे छूकर, मुझसे लीपट ही गयी 
बेशक रहा वो, संग किसीके 
प्यार मुझ ही, से करना था 

मुझसे वो कहता, न कहता सही 
आहों ने उसकी, वो हरकत करी 
न दिया साथ उसने, तो शिकवा हो क्यों 
मुझे संग उसीके, तो चलना था 

हर दिन कुछ दूरी, बढती रही 
मोहब्बत सर मेरे, चढ़ती रही 
तोहफ़े हँसीं वो, कुछ पल थे रहे 
मदहोशी में जैसे, मचलना था
आघ्होश में उसके, पिघलना था 
बेपरवाह संग उसके, न संभलना था 
इन साँसों का उन साँसों में यु ढलना था
 

Wednesday, March 13, 2013

ओझल निशाँ और राहें मुश्किल 
आज कुछ ज्यादा ही रोया है दिल 
 

Tuesday, March 12, 2013

मनभावन को देख, यु मचल सा जाये रे
गद गद हो झूमे, क्यों हाथ न आये रे
किये सब जतन, जो केह्ते हैं ज्ञानी
दिल ने  कहाँ कब, किसीकी है मानी
चंचल हो पल पल, वो अरमाँ से खेले है 
हर पल सजाये, मिलन को वो मेले है 
नाहक ही, चाहत की चाहत संजोता है 
कहता नहीं है, मगर वो भी रोता है 
यादें ले आती हैं, संग उसके साए भी 
अक्सर हुआ है, ना आकर वो आये भी 
यु तो समझता है, पागल नहीं है दिल 
देख के उसको, बस बढ़ जाती है मुश्किल 
आलम दोहराता है, वो बिखरी कहानी 
आँखों से बहकर, आंसुओं की ज़बानी 
तूफ़ान के आने में , सैलाब के जाने में  
झूटे उस कच्चे से, मौन के बहाने में  
नीन्द से रुसवा, मेरी तनहा सी रातों में 
बे-इन्तेहां दर्द की, रूहानी सौगातों में 
आते तो हैं, वो ऐसे आ ही जातें हैं 
बिन छुए , वो एहसास जगा ही जाते है 
जो आयी न समझ में अब तक, वो बात बस इतनी है'
तनहाइयों की ये लड़ियाँ और अब कितनी हैं 
वो है पक्की मिटटी के, उनके हैं और सलीकें 
उनसे बेहतर जाने हम उनके तौर तरीके 
वो तो जाने कब छुटेंगे, उनके अभिमान से 
छुट न जाए साथ मेरा, मेरे दिल-ओ- जान से 
मन की माने, इस पल ही, उनके सीने से लग जाएँ 
रो ले उसकी बाँहों में , वो चाहे या न चाहे 

Friday, February 1, 2013

जो अबके हैं बिखरे 
हम रेत की भाति 
कैसे समेटे ये
तिनके हज़ार 
मद्होंश होजाना 
कुछ नया तो नहीं 
बेहोशीं के ज़रिये 
कुछ बदल गए 

आवाज़-ओ-लहज़ा 
कुछ नहीं बदला 
बदला है तो बस 
अंदाज़ बात का 
मान, स्वभिमान 
कब अभिमान हुआ 
इस बात का इल्म 
शायद नहीं उसे 

लकीरों पे यकीं 
जब खुदसे ज्यादा हो 
अफ़सोस , फिर लकीरें 
ख़ुदा बन जाती हैं 
कदमो का दोष क्या है 
वो तो बोझ ढो रहे
रास्तों का चयन तो 
दिलो-दिमाग ने किया 

लौटकर आउंगी
तब फुर्सत से खोजूंगी
जो खोये है उलझनों मे
मैंने लम्हे कई कीमती
सुबह के हलकी रौशनी में
खुली हवा में अंगड़ाई
साँसों की रफ़्तार को
फिर धीमी कर देखूंगी








 

Tuesday, January 29, 2013

आ की मिलकर खोजें ज़रा 
जो खो दिया दोराहो पर 
तेरे एहम की ठोकर पर 
मेरी जिद की चाहों पर 

कदमो तले  की मिटटी को आ 
हाथों से कुछ नर्म बनाये 
पेड़ो से तहज़ीब खरीदें 
खुदको थोड़ी शर्म सिखाएं 

बिखरे पड़े सुखें पत्तो को 
कुछ अरमानो की उर्मि देदें
कांटो में छुपे,फूल भी है आ 
सूझ बुझ से दोनों लेलें 

तपता सूरज सर पे चढ़कर 
सँयम के सलीके टटोलेगा 
चल संग थामे, धैर्य की डोरी 
किन अंगारों से हमें तोलेगा 

जब गुजरेंगे नदी के किनारे 
ठहरे आंसू , उन्ही में बहा लेंगे हम 
छुपा लेना मुझे, तू  सीने से लगा 
ग़म को, एक दूजे में छुपा लेंगे हम 

कुछ पाव के छाले रोयेंगे 
कंधो का बल भी टूटेगा 
सफ़र की साँसे रहेंगी तब तक 
तेरा साथ न जब तक छुटेगा 

चलते चलते शाम ढलेगी 
न जाने ले जायें रास्तें कहाँ 
मुड़ के जो चाहो, तो "जाना " चले जाना 
छोड़े है तेरी ख़ातिर हर मोड़ पे निशाँ 

Thursday, January 24, 2013

धुप मैं तपती सड़क, और तू खड़ा 
मेरी आँखों मे पानी, वो सिसक याद है 

आखरी लम्हे, तेरा चेहरा उदास 
मौन में ढल रही, वो तड़प याद है

उससे पहले मगर, जो हम संग रहे 
तीखे-मीठे किस्सों की कसक याद है 

वोह रास्ता जिस पर, हम पैदल चले 
उस शाम का साथी, वो फलक याद है 

वो पेड़, वो मंदिर, वो तालाब की पाल 
उस लम्बे सफ़र की, हर झलक याद है 

वो बातें,लडाई , वो नाराज़गी मेरी 
मुझे मनाने की तेरी, वो कसक याद है 

हसकर,कसकर , मुझे गले से लगाना 
प्यार मैं वो ज़िद ,तेरी अकड़ याद है 

तेरे छुने से, जो रोम रोम पिघल जाता था 
बिन अवाज़ के, उस तूफ़ान की खनक याद है 

मिलो के फासलों पर, खयालो के खेल में 
मन में तुझे,  देख पाने का असर याद है 

खुद से ,तुझसे ,चाहे सब से मैं कह्दु,
भूल गयी मैं तुझको, "तू" मगर याद है।
ख्वाब में,खुद में,सच में,कहानी में 
हर ज़र्रे में तू,"तू" इस कदर याद है।





 

Monday, January 21, 2013

मौजे-ए -दरिया, सब  तेरे रहे 
कतराए जुनूँ सा ,हम ले चले 

टहेरे से रास्ते,क्यों  हुए तवील 
चले तो मंज़िल,ज्यों कदमो तले 

आई न समझ, कई बातें तेरी 
बर आये तुझसे, तो दुश्मन भले 

हमे दे दर्द का, वो दामन ज़रा 
काश के मोहब्बत, तुझे तो फले 

हथेली पर चाँद तो, हम ला न सके 
आँखों में, तेरे नाम के है दीपक जले
 
और करीब तेरे, हम होने लगे 
प्यार तोड़ नफरत, जो की मनचले 

खोज में तेरी, 'जाना'  मिला कुछ बहोत 
तू न मिला, तो हम खुद खो चले 

नैनो में ठंडा, कुछ पानी ले भर
रोलेना, जब मेरी साँसे ढले
 

Sunday, January 20, 2013

कमर का करहाना 
कंधो का झुक जाना 
आँखों के काले घेरे 
और ख्याल मेरे।
कहना है ये सबका 
समय को थोडा खदका 
कदमो का रुख मोड़े  
कुछ मन का सुख खोजे। 
कही छाँव में अब लेटें 
कुछ खुला सा नभ देखें 
छोडके काली  सिहायी 
सवालों को दे रिहाई। 
लम्बी गहरी साँस भरूँ 
कुछ ऐसा अब मैं करूँ 
कही दे न तू दिखाई 
तेरी यादों की बिदाई। 
ना तुझपे और सितम 
बोझ करूँ कुछ कम 
न देखू मूड के और 
वो मुश्किलों का दौर। 
बातों के समंदर को 
आँखों में करलूं बंद 
नम्कीं तेरी ज़बाँ से 
मीठे भी बरसे थे चंद। 
अब और नहीं उठ्ते 
इन कंधो से तेरे ईनाम 
रौशनी के वादे बिखरे  
प्यार की हो गयी शाम। 
समेटें अपना वजूद 
समाके खुद में  खुद 
तेरे अक्श को कर जुदा 
आ तुझको करूँ विदा।
हाथों में थाम के चेहरा 
तेरे माथे को चूमकर 
कभी ना खोलू फिर मैं 
इन आँखों को मूंद कर। 

 

Saturday, January 19, 2013

तेरे आंगन से मेरा दामन तुझे, भरा ही दीखता होगा 
मेरे आंगन से मेरा दामन, आ ,इक बार ज़रा तू देख।
तेरे मिट्टी  पे ही  बरसे है,फिजा के सावन हरे भरे 
मुझे पतझड़ से है मिला,आ ,कितना हरा तू देख।

मौन के तरकश से निकले , बिन शब्द तीखे तीर थे 
हालाँकि ज़बां तेरी, कभी क़त्ल से कतराई नहीं। 
तनक के तोड़ी कच्ची डोरी,नाम जिसका विश्वास था 
रुआब देखते बनता है, नज़रे तेरी क्यों लज्जाई नहीं। 

हाथ मेरे हाथों में  रख, आँखों से आंखें मिला 
बहने दे कडवे लहू को,मैं भी देखू रंग तेरा। 
मुझे छु कर भी तू अगर, सच को छुपा सकता है 
क्या समझू मैं, बेमानी था, पाया जो मैंने संग तेरा। 

फ़कीर तो मानो  मैं हुई, पाकर भी सब खो दिया 
साथ मेरे तू रहा है ऐसे ,खुली आँख का सपना कोई।
पल से छोटे पल मैं टुटा,दिल का हर एक हिस्सा यु 
देह त्याग के जाये जैसे, जान  से प्यारा अपना कोई। 

 

Friday, January 4, 2013

मिलके तेरे ख्याल से, मेरे ख्याल लौटें  हैं 
साथ उनके मुश्किल , कुछ सवाल लौटें  हैं 
 
मेरी हथेलीयां , अपने  हाथों मैं लिए 
आँखों से चूमकर, जो सपने दिए 
 
लापता उन ख्वाबो का, निशाँ ढूंढ़ते 
नमी को, पलकों की चिलमन से मूंदते 
 
आवाज़ दे रहे हैं, धीमी पुकार से 
मायूसियो का झोका, हक़ से नकार के
 
पथरीले फासलों को ,हाथों से साफ़ कर 
तेरे दिल का हाले जहां, साँसों से माप कर 
 
कदमो को फूँक फूँक, रखा' ज़मीन पर 
बिन तेरी इज़ाज़त , तुझे तुझसे छिनकर 
 
कुछ पल के लिए लायें है , महफ़िल मे वो मेरी 
इक अरसे से इस दिल को,  आरज़ू है बस तेरी 
 
लेने जवाब मुझसे, कुछ सवाल लौटें हैं 
भरके तुझे बाँहों मैं, निहाल लौटें हैं 
मिलके तेरे ख्याल से मेरे ख्याल लौटें हैं 
साथ उनके मुश्किल , कुछ सवाल लौटें हैं
 
 
 
 

Tuesday, January 1, 2013

मौसम ,
जिद ,
और मेय के खंजर ....
रात,
नशा,
और चाँद के तेवर ..
 
खुसबू,
धुआ,
आँखों के जाम ...
साए,
ख़ामोशी,
और तेरा नाम .... 
 
याद,
दर्द,
बिखरा जुनूँ ....
दूरी,
मौन,
फिरभी सुकूँ ....
 
गीत,
तन्हाई,
राहें  सुन्सां ...
मेरा,
अपना,
हो गया मेहमां ...
 
शब्द,
कागज़ 
न पूरी किताब ...
वो तनहा ,
हम तनहा,
हो गया हिसाब .... 
 
 
 
 
 
बेह गया तो पानी
थम गया तो दर्द 
ज़बां कहदे  तो ठीक 
न कहे, तो कमज़र्फ 
थक तो हम भी गए है
दिल को इत्मेनां नहीं
चाँद तो चुरा लिया है
रखने को आस्मां नहीं
कदम थिरक थिरक है 
गला है भरा भरा 
महफ़िल अभी लगी है 
कुछ और तो रुकिए ज़रा 
बे-इज्ज़त हुए है हम तो 
शक भरी तेरी नज़र से 
शराब से बहक गए क्या 
प्यार बरसा है किस कदर से 
गिले शिकवे क्या करें अब 
क्या करें हम तुझसे नाराज़ी 
हर गुनाह तेरा भूल जाएँ 
तू नज़र करे जो ज़रा सी 
 

Wednesday, December 12, 2012

पढ़ा है खूब तुम्हे , अब किताब लिख रहे हैं
 मिले तो अँधेरे, पर आफताब लिख रहे हैं

हमारी वफ़ा पे यु, जो लागए हैं इलज़ाम 
तुम्हारी ही  जफ़ा से, जवाब लिख  रहे हैं 

जुदाई में जो बरसा, आँखों से खारा पानी 
न कोसेंगे तुम्हे, मिसरी सा आब लिख रहे हैं 

यादों का सिलसिला, कभी थमा ही नहीं 
दीवानगी का ज़ीम्मा, हम शराब लिख रहें है

 कुछ ऐसे ठेहर  जाती थी, नज़रे तुम्हारी हमपे
खुद ही खुदको हुस्न, और शबाब लिख रहे हैं

तुमसे बुरा ना कोई ,पर अच्छा भी नहीं 
भुलाये कैसे, मजबूरियों का साज़ लिख रहे हैं 

ऐसे चले गए तुम, ज्यो खो जाते है साए 
बिखरी उन परछाईयों से, ख्वाब  लिख रहे हैं 

तुम कहते होना जाना, तुम देते ही रहे
जो चाहे लेलो हमसे, हम हिसाब लिख रहे हैं

ये इश्क नहीं तो क्या है, न चाहते हुए भी क्यों हम 
नाम तुम्हारा लेकर, बेहिसाब लिख रहे हैं  

Sunday, November 25, 2012

'दिलगीर' , उनकी बज़्म से, दिल पे ख़ार ले आये 
समझे नहीं वो, हम लौटते, प्यार अपना ले आये 

'गमे -जाना' चेहरे पर, शिकन  तो ले आता है 
आँखों का पानी मगर, हम उनको तोहफा दे आये 

'सरे-अफ़्लाक' पर शब भर, चाँद-तारे रहे मगर,
सहर हुई, सूरज की तपन, फलक को तन्हाई दे आये 

'दहर' में होंगे, और भी, हमसे काबिल दीवाने 
'जू-ए -रवा' से इश्क को अपने, 'कतरा-ए-शबनम' कह आये 

'अफ़सू' है उसकी चाहत का,उसमे बुराई दीखती नहीं 
'गुरेज़ा ' होने की वजह , हम नाम अपना दे आये 




दिलगीर- sad
गमे -जाना-pain for lover
सरे-अफ़्लाक-sky
दहर-world
जू-ए -रवा-flowing river
कतरा-ए-शबनम-dew drop
अफ़सू-magic
गुरेज़ा-sad

Saturday, November 24, 2012

पैरो के नीचे ठंडी ज़मीं 
सर पर चढ़ा बुखार प्यार का 
इससे और प्यारी सुबह क्या होगी 
आँख खुले और दीदार यार का 

प्रत्यक्ष नहीं 
ख़याल सही 
सुबह मगर 
हँसीं तो हुई 

भरम टुटा 
खयालो का 
पैरो में आई 
जब ठंडी ज़मीं 

Sunday, November 4, 2012

उल्फत के दो पहलु, 
इक हम ,
इक तुम .

बाकी जो दरमियाँ में रहा ;
वो मौसम का तकाज़ा  था .

कभी आँखों से पिया था; 
कभी साँसों मैं जिया था ,

तीखी थी मुलाकातें कई पर;
बारीशें मिसरी ही रहीं .

गुब्बारों में छुपकर सोचा ;
ये दुनिया हमारी हुई ,

कांटो में उलझकर अरमां; 
मिटटी होकर बिखर गए .

हाथो की नज़दीकियों  में ;
मौसम नरमाई दे गया ,

दोनों उसी रास्ते पर है ,
दिशायें विरोधी हो गयी ..

बयानों के पर्चे ख़त्म ना होंगे 
हा मगर,
सुनने को अब हम तुम नहीं ..

Monday, October 22, 2012

ये क्या बात हुई,
                        की हर जगह मिल जाते हो,
कभी ख्वाब,
कभी खुश्बू ,
कभी ख़याल बनके !!!!!!!!

कभी ख्वाइशो का आसमां लिए ,
                         कभी वजूद-ए -इश्क का सवाल बनके !!!!!!!!!
 

Friday, October 19, 2012

कभी, कही, कोई अगर मुलाक़ात होगी 
 
अब आंसुओं से ही, शुरुआत होगी 

खुसी के या ग़म के, ये वक़्त बतायेगा 

मगर है यकीं , के बरसात होगी 
लकीरों से तकदीर की कहानी पूछी है
आँखों से इश्क की रवानी पूछी हैं
कैसी दीवानगी इस कम्बख़त ने की
उनसे ही उनकी बेमानी पूछी है

वक़्त के  इस पहर मैं तस्वीर देखकर
उनकी आँखों से क्यों इक  सवाल कर दिया
उम्मीद ऐसी है, कोई जवाब आएगा
नामुमकीन बातों पर नादानी सूझी है







 

Tuesday, September 25, 2012

इक शक़, इस ज़ेहन से जाता नहीं
इत्मीनान, वजहों को आता नहीं
दिल का तक़ाज़ा  है, ये हो नहीं सकता
सच के इस पेहलू को, हम नाकारा करतें हैं ...
हालात मगर, कुछ और ही इशारा करते हैं ...

बीतें लम्हों की सिलवटें, पलकों पर दिखतीं हैं
झूटे प्यार की कहानी, बे-मोल बिकती हैं
देखिये की,  प्यार ने यु मजबूर कर दिया
अब भी, उनकी यादों को ग़वारा करते हैं ...
हालात मगर, कुछ और ही इशारा करते हैं ...

ख्वाब भी जाने कैसे कैसे रंग बदलते हैं
गम हमारा ..., क्यों उनकी आँखों से ढलते हैं
यु देखें तो नफरत भी, अब छोटी लगती हैं
फिर क्यों नत-मस्तक, हम उनसे हारा करतें हैं ...
हालात मगर, कुछ और ही इशारा करते हैं ...

खामोशियाँ कभी, साँसों मैं उलझ सी जाती है
मन की नदिया, बिन पानी के सुलग सी जाती है
अल्फाज़ो का तूफ़ा, ज़बा को छलनी करता है
मौन का वास्ता देकर , हम गुज़ारा करते हैं ...
हालात मगर कुछ और ही इशारा करते हैं ....

सच के इस पेहलू को, हम नाकारा करतें हैं ...
हालात मगर, कुछ और ही इशारा करते हैं ...

Tuesday, July 3, 2012

शाम काजल फेला ही गयी
भूले भटके कुछ आ ही गयी
रुखी सी , बिखरी सी कडवी हवा
आँखों से पानी बहा ही गयी

मैंने अब दिए जलाये नहीं
उजाले कभी रास आये नहीं
मासूम से बादल आंधी ले आये
साथ अब कोई हमसाये नहीं

गरजे कहीं , बरसे कहीं
मन के फुहारे लर्ज़े कहीं
जस्बातों का खून हो ही गया
बिन बोले अल्फाज़ तरसे कहीं

क़त्ल तो हुआ था , मानों  या नहीं
ऐतबार को दफ्न कर दिया कहीं
सोचो तो नफरत भी कम पड़ती है
भूल जाओ तो प्यार कभी किया ही नहीं

ख्वाबो की नींदों से बेरूखी सही
कमसेकम वो ख्वाब आते नहीं
आँखों मैं आंखें वो डाल  कर कहें
दिल मैं अब और प्यार रहा ही नहीं

Saturday, March 31, 2012

शायद  कोई  ख्वाब था,
शायद इक  याद!
बीते हुए वक़्त से, झाँक रहा था कोई.

बरसो  पुराना, एक निश्छल लम्हा,
बेक़सूर आंखें, मासूम सी हसी ...
यकीन न हुआ, ये उसका चेहरा था !

उसको अब भी देखा है,
उसको तब भी देखा था
फिर भी जाने क्यों,
हर बार मेरे खाब में वो पहले सा आता है.

बीते कल और रहते आज  में, कहीं खो जाती हूँ..
छूकर उसे खुदको, मैं यकीन दिलाता हूँ..
ख्वाब ही है, ख्वाब ही था, ख्वाब ही रह जाएगा,
वो निर्दोष चेहरा, बस ख्वाब ही मैं आएगा !


इस बात पर यकीन करना, बेहतर तो नहीं लगता...
गुज़रे पलों में फिर भी हो आना, अच्छा लगता है..!

 
  

Friday, November 25, 2011

हैरान सी,
परेशान सी,
बढे जा रही है,
पथ्थरो पे नंगे पाऊ...दौड़े जा रही है ...
ज़िन्दगी ने ज़िन्दगी का देखो कैसा हाल किया !

दूर कही,
जैसे कोई,
मंज़र सा है,
शायद मंजिल का निशाँ,
रुक न जाये कोई कही, भरम का ऐसा जाल किया !

Thursday, November 10, 2011

नफरत ना सही,
कुछ कम भी नहीं..
असमंजस के सागर में गोते खा रहे हैं!
दो कदम उनकी तरफ,
दो कदम उलटे पैर ...
डगमाते रास्ते कहाँ जा रहे हैं !

कभी हवा के साए में,
कभी धुंए में कही...
धुंदली तस्वीर से रंग जा रहे है !
कौन कहता है अंधेरो में,
खो जाते हैं लोग...
चाँद से बेहतर ,वो नज़र आ रहे है !

उम्र  के दायरे में,
सब एहसास नहीं आते..
कुछ अरमान अब देखो कहाँ जा रहे हैं !
जिस मोड़ पे खाई थी,
हर कोशिश ने ठोकर...
होके बेलज्जा, सब वहा जा रहे है !

Saturday, October 22, 2011

उसकी बेशर्मियत  की हद्द देखि
अपनी बेवकूफ़ियो का असर देखा !

विश्वास की धज्जियां उडी और जली
बय्मानी का धुआं दर बदर देखा !

आँख मूंदे चल दिए साथ उसके
धोके का जाल, न एक नज़र देखा !

सच के मुखोटे में झूट छूप गया
फरेबी ने प्यार से, इस कदर देखा !

उसकी आँखों से हर पहलु, चुना और बुना
नामुमकिन कुछ ख्वाबो का बसर देखा !

नियत मैं खोट का इल्म न हुआ,
जब तक न खुद पर टूटता, कहर देखा !

कहते  रहे लोग, कभी सुना  ही  नहीं 
प्यार मैं डूब जाने  का हषर देखा !

शहद में डुबोके जो हर शब्द कहता था
उसकी बातो में अब उगलता ज़हर देखा !

इस बात की तस्सली देके, खुद को संभाला है
शुक्र है उसके साथ ना, हर पहर देखा !

मगर एक अफ़सोस आखरी दम तक रहेगा
आखिर क्यों उस कमज़र्फ  का, शहर देखा  ! 

Thursday, July 7, 2011

रूख़ करो जिस ओर, हवाएं रेशम हो जाएँ 
कदमो के नीचे की मिटटी, मखमल बन जाएँ

खुशबू से यु महक उठे, गूंचे अरमानो के
गुल ख़्वाबो के सजा के लाये, लश्कर पैमानों के

कुबूल-सूरत वो हम-पाया, जिसने अरमानो को जोड़ा
सिफ़र सा धूल में खो जाए, जिसने कसमो को तोडा

बानसीब वो सख्सियत, जो हमराह बन चले हैं 
खुदा नवाज़े नसीब से, जो हमसे इतने भले हैं

न होना मुफ़ारकित  उनसे, न हो कभी ग़म का सामना
कुर्बत रहे उस सरोश से, हर पल दामन को थामना

असास ऐत्बार का हो, रहे ये मिलन अज़ल तलक
जो खुशियाँ तुमने है चुनी, रहे मुकम्मिल जैसे फलक

आफ़ताब-आलंताब करे, रोशन तुम्हारा आँगन हो
जो चाहो वो इतना आये, लद लद सारा दामन हो


पास-आब ये ख़याल आया, अब नाम तुम्हारा ले न कभी
बद-रफ़्तार गुज़र जाए, गुज़रे लम्हों के किस्से सभी

क़र्ब न इतना हावी हो, की हम फिर से कुछ कह जाए
फासले हममे इतने रहे, बस फासले ही रह जाए

पाश-पाश हो गए घुमान-ओ' फ़ैल गए थे अफ़साने
तजवीज़-आखिर ये तय हुआ, रहे बनके अब अनजाने

यकीन जानिए, बे सबब है, ये जो आया गुब्हारे-दिल
वरना तो हर लव्ज़ में फ़िदायी, है लाखो दुआ शामिल

मौका खुशनसीब है, जुड़ जाए है दो ज़िन्दगी
तौफे मैं ज़िया  देते है, और लेलो हमसे तिश्नगी

गफ़र चाहेंगे , नामुनासिब ज़िख्र, अगर कोई हमने किया
ये भी देदो जाते हुए, जब रहते हुए है इतना दिया        

कुबूल-सूरत - beautiful
हम-पाया -similar
सिफ़र-zero
बानसीब -lucky
मुफ़ारकित-separation
कुर्बत-closeness
सरोश -an agel
असास-foundation
अज़ल-eternity
आफ़ताब-आलंताब  -the sun illuminating the world
पास-आब-consideration of someone's reputation
बद-रफ़्तार- at the speed of wind
क़र्ब-pain
पाश-पाश -broken into pieces
तजवीज़-आखिर- last decision
फ़िदायी - lover
ज़िया-light
तिश्नगी -longing
गफ़र-forgiveness

Tuesday, July 5, 2011

तेज़ हवा ने चेहरे को जुल्फों से ढक दिया
नम आँखों ने पलकों में तेरा चेहरा रख दिया

भूल गए थे पीना, एक अरसे से प्यास रही
ऐसे याद आया कोई, हर मय को चख लिया

दामन में ख्वाबो का पलना कैसे हो मुमकिन
पल्ला मेरे सर का लेके, किसीने रख लिया

सुना था चाहतो का कोई स्वाद नहीं होता
हमने तेरे इश्क में, हर जाएका है चख लिया

ख्याल जो हर बार मिला देते है मुझे तुझसे 
आज उन सबसे मैंने,  कह दिया  तख़ लिया 
 

Saturday, July 2, 2011

तुझको देकर भूल गए
कुछ ख्वाब बड़े नाजुक से थे
आज दामन खोल के देखा
यादों के सिवा और कुछ भी नहीं

हाथ मैं साँसे रख्खी  है,
पैरो मैं हवा को बाँध लिया
जीने पर अफ़सोस नहीं तो
मर जाने का ग़म भी नहीं  
 
दिल मैं समां जाये, वो याद कैसी
लव्जो मैं बयान हो तो फ़रियाद कैसी
जाते हुए छोडे न जो कदमो के निशाँ
उनसे हुई ऐसी मुलाकात कैसी

  

Monday, June 27, 2011

बात कोई भी याद नहीं,
शायद सब कुछ भूल गए,
हमने भी करवट लेली
जब उसने आँखें मूंद लयी

माथे पर शिकन कैसी
ग़म तो कोई दीखता नहीं
हर सुबह तुम्हारी हँसती रहे
शिकवो की वो रात गयी    

जस्बातों का मेला है
थक कर फिर सो जायेगा
इतना क्यों घबराते हो
रिश्तो का ये मेल नहीं

आज भी है और कल भी होगा
फासला जो तेय न किया
सेतु कोई यहाँ भी बने
ऐसा तो मुमकीन ही नहीं  
बरसो पुराना रिश्ता, कहीं मिल गया 
ऐसी हुई टक्कर
ज़िन्दगी बदल गयी 

पीछे कुछ सपने, आगे हकीकत
बीच दोराहे
साँसे मचल गयी

रिश्तो के धागे कच्चे सही
अब तक इन्ही से
आगे नसल गयी

बाकी सब बातें, भूल के भुलाई
बात मगर जिद्द की
खरी असल रही

ख्वाब भी टूटा, रिश्ते भी
मगर कुछ दुहाई
ऐसे अटल रही

हम भी वोही और वो भी वही
देखने की बेशक 
नज़र बदल गयी
 

Wednesday, May 18, 2011


कुछ  नज़र  में , कुछ  लबो  पर  सजा  दीजिये 
हमें  भी   नफरत  हो  जाये , वो  वजह  दीजिये

सुकून  के  मौसम  में  खूब  दिया  हमें 
बेचैनी  की  रस्मे  भी  अब  अदा  कीजिये 

होंश  में  रहे  हम , तो  दर्द  ही  बाटेंगे 
प्यार  करलें  कुछ  आपसे , कोई  नशा  दीजिये

न  रहा  कोई  ख्वाब , न  ख्वाबो  की  ज़मीन 
मिटटी  को  वो  महल , अब  मिटा  दीजिये

धुए  में  रासते  हैं , और  रास्तो  पर  हम
इक  तमाचा  जड़  के , हमें  जगा  दीजिये

शायद  बदकिस्मती  से,  फिर  देख  लो  हमें
न  हो  ग़म  दुबारा ,  शक्ल  भुला  दीजिये

माफ़ी  तो  नहीं  बनती , और  न  ही  कभी  देना 
मगर  हक  बनता  है , कुछ  सज़ा  दीजिये

Monday, April 18, 2011

खुली आँखों से देखे ख्वाब का , हकीकत से ज़्यादा वजूद हो,
पलकों से कोई चुरा न ले जाए, पहरेदार खुदा खुद हो
आईने मैं दीखते चेहरे की लाली, किसी के ख़याल से खिल जाए
किसी की मुस्कराहट में, जीने की वजाए मिल जाए
बातों के किस्से अनगिनत, बात वो फिर भी रह जाए
इक स्पर्श किसी का पल भर में, किस्सा सारा कह जाए



Tuesday, March 8, 2011

इक सुबह ऐसी हो,
तूझे जागते मैं देखू,
सूरज की नर्म किरणों में  तेरी आंखें खुल रही हो,
तेरे चेहरे की मासूमियत यु धीरे धीर उभर के मुस्कुराये
तेरी अंगडाइयों  की सिलवटो को कुछ बेचैन पाऊं  
तेरी शांत धडकनों को मेरे खयालो में खोया देखू
सुबह के पहले पहर तुझे में अपनी यादों में शामिल देखू,
कितना खूबसूरत वो पल हो, जब तेरे अक्ष मैं सिर्फ मेरी झलक हो,
और जिस मौड़ बेचैनी चरम पे हो,
मैं आके तुझे गले लगालू, और तेरे आघोष में खुदको खो दू...

Monday, March 7, 2011

क्या है तुझमे वो, जो बेकरार किये जाता है
कौन है मुझमे वो, जो इंतज़ार किये जाता है
समय के दोराहो ने,मुझसे हक छीन लिया
फिर भी ये दिल है, जो प्यार किये जाता है   

Thursday, March 3, 2011

चिलमन से चेहरा छुपा तो लिया
धड़कन को कैसे छुपाओगे  तुम
खुसबू तुम्हारी जो साँसों मैं हो
इसको कहाँ लेके जाओगे तुम

होतीं अगर राहें इतनी सरल
चाहतो मे मज़ा फिर क्या आता सनम 
कभी हार को भी सर-आँखों पर लो,
हर बाज़ी फिर देखो, जीत जाओगे तुम..

तकल्लुफ न करना मोहब्बत में कभी,
उल्फत में खुदको मिटा देना है 
फासलों को जितना, नज़र-अंदाज़ करोगे
उतना मेरे पास, खुदको पाओगे के तुम....
 
बेमतलब,
नाजुक बड़ी,
कमज़ोर सी है,
हमारे बीच जो खड़ी,
बेकाम की दीवार...
बस नाम क दीवार....

मौन है तो क्या,
वजह भी खूब है,
खुद हमने है चुनी,
कुछ ख़ामोशी और ये,
बेकाम की दीवार...
बस नाम की दीवार...

समय को रोका है,
या रुक गए खुद हम,
या रोक दिया रास्ता,
लकीरों का, मढ़कर
बेकाम की दीवार...
बस नाम की दीवार...     

कुछ तनहा लम्हे,
थोड़ी नजदीकियां,
एक नज़र प्यार की,
देखो कैसे गिरती है,
बेकाम की दीवार...
ये नाम की दीवार 
 

Monday, February 14, 2011

सहज भाव से बहला  देना
आऊं कभी तो सहला देना
जिस भी जीवन में मिलो तुम
प्यार मुझे ही पेहला देना



Thursday, February 10, 2011

हसीन  एक किताब हैं,
हर किसी के लिए मगर, 
इस ज़िन्दगी को जाने कितने पढ़ पाते हैं !
कुछ जीतें है प्यार से,
हर एक कहानी..
और कुछ,
बस..पन्ने पलटकर आगे बढ़ जाते है !

Wednesday, February 9, 2011

हार का एक रंग, तुम भी देखोगे
जीत का  एक रंग, यहाँ भी आयेगा
किसके रोके रुकी है, लकीरों की कश्तियाँ
लेखा - जोखा सारा, यही निभ जायेगा


कागज़ के फूलो पर, इत्र ना छिडको
धुप की दो किरणों में, सबकुछ  उड़ जायेगा
जो मान के बैठे हैं, हर बात तुम्हारी सच्ची
वक़्त आने पर, उनका भरम टूट जायेगा

रिश्तो को तोलते तोलते, वो वक़्त गुज़र गया
उन पलों की मासूमियत, कौन लौटाएगा
फितरत है की वादा, कभी छोटा नहीं किया 
बस ये नहीं मालूम, की उसे कौन निभाएगा

Saturday, January 29, 2011

गुब्बारों सा फोड़ दिया
ख्वाबो का रुख मोड़ दिया
सिने से लगा का कहा था
हाथ कभी ना छोड़ेंगे
जाने ऐसा क्या हुआ
पल में साथ छोड़ दिया

सनम से ज़िरह की फेरिस्त नहीं बनती 
इश्क लौटने की कोई किश्त नहीं बनती
तुम ये सोचो, गलती काबिल-ए- माफ़ नहीं
हम ये सोचे, ऐसी सज़ा हरगीज़ नहीं बनती

ख्वाब और हकीकत में जो दरमियान रहे 
तुमसे इश्क में जाने कितने इम्तेहान रहे
अब तक तो रहे इस दिल के आस पास ही कहीं
गए जो हमसे दूर, अब जाने कहाँ रहे

Sunday, January 23, 2011

शब्दों की कुछ कमी सी है
दिल में आज नमी सी है
लिखना बहोत चाहती हु मगर
साँसे उलझ में रमी सी है 
             शब्दों की कुछ कमी सी है


ज़हन में बातें झूझ रही
मुझसे क्या क्या पूछ रही
पन्नो पर कैसे में लाऊं 
कलम मेरी कुछ थमी सी है
             शब्दों की कुछ कमी सी है


चुप कहाँ  रहती हूँ  में
कितना कुछ कहती हूँ  में
आज मगर आँखों के आगे
माटी की परत, जमी सी है
              शब्दों की कुछ कमी सी है

कहते कहते कितना कहा

बात मगर वो रह ही गयी 
जिससे मन व्याकुल सा है
जिससे दिल में नमी सी है
               पर, शब्दों की कुछ कमी सी है 

क्यों ख्वाबो के कारवां थमते नहीं
क्यों उमीदों की डोर कटती नहीं
क्यों आँखों का पानी सुख जाता नहीं
क्यों किसी को भूल जाना आता नहीं
क्यों रास्तो से राहें खो जाती है
क्यों मौन में भी बातें हों जाती है
क्यों दूरी भी इश्क में अखरती नहीं 
क्यों यादों पर कभी धुल चढ़ती नहीं

Friday, January 21, 2011

सुबह  तक जो "है " में था , वो "था " में हों गया
फिर किसी का "अपना", कही खो गया
ये कैसी प्रथा , यह कैसा नियम
कुछ पलों के फासलों  में फैसला हों गया


वो जिए, हसें, संग रहे, और अब चल दिए
कहाँ , क्यू, किसलिए, कोई कहता ही नहीं
बस इतना इल्म है सबको, जो मुझे भी हुआ
की हमेशा के लिए कोई यहाँ रहता ही नहीं


एक शारीर, जिसे हम इक रिश्ते से पुकारते रहे
आज उसी को कुछ लोग अग्नि को सौंप आये
लेकिन उसमे जो इनसान बस्ता था, वो कहा गया
कैसे क्या करें, की वो फिर लौट आये



उसकी आवाज़, उसकी यादें, उसकी बातें
कभी दूर ना जाएँगी
कई मोड़ पर, कई राह में, उसकी हिदायतें
अक्सर याद आएँगी


यु तो कई अपनों, कई परायों को ऐसे जाते देखा है
फिर भी आज जाने क्यों, ये ख़याल आ गया
कुछ और लोग आने वाले समय में जायेंगे
कुछ और अपने, साथ अपना छोड़ जायेंगे
हर बार, एक दर्द, एक कमी, एक खलल रह जाता है
जाने कैसे इस दर्द को, ह़र सख्श सह जाता है
ऐसे एक दिन में भी तो जाउंगी
कैसा होगा एहसास, उन सबको छोड़ के जाने का, 
जिन्हें खुद से भी ज्यादा प्यार किया हों 
मुझे पता है ये सब सोचना व्यर्थ है, 
क्यूंकि मौत बताकर नहीं आती, 
लेकिन फिर भी ये ख़याल आ रहा है,
की क्या में मौत से हार जाउंगी, डर जाउंगी
या फिर हस्ते हुए, औरो की तरह, 
ज़मीन के उस और, जाने कहाँ,
उस श्रुजन करता में खो पाऊँगी ..
क्या में भी सब के मन  में याद बनकर  रह जाउंगी
या कहीं, किसी के दिल में, हर पल जीती जाउंगी
पता नहीं, कैसे होगा मेरे इस जीवन का अंत,
पता नहीं कब ये माटी फिर माटी में भल जाएगी
पता नहीं वो सुबह किस रंग में आएगी

Wednesday, January 19, 2011

अमन के पंछी, कहरों में नहीं आते
सागर के मोती, लहरों में नहीं आते
जो आते है खुशनूमा, आज़ाद खयालो में 
वो हसीं खाब , पहरों में नहीं आते

Saturday, January 8, 2011

एक आवाज़ पे हमारी, लौट आएंगे वो..
समेट लेंगी फिरसे, वो बाहें हमें..
भुलाके वो शिकवे और सारे गिले 
शर्त है जो फिर ना, वो चाहे हमें ..

मगर बात सारी, थम जाती है यहीं
की आवाज़ हमारी उनतक, अब जाती ही नहीं..

Thursday, December 23, 2010

चाँद से होके नाराज़, एक तारा टूट गिरा
और मैंने सोचा आज,
कोई ख्वाइश पूरी होगी....
आँखें बंद किये, मांग लिया कुछ ऐसा
देखे कैसे खुदा की,
आज़माइश पूरी होगी.....


तारा हों गया ग़ुम, देके एक चिंगारी
काली रात को
और उलझे ख्वाब को.....
बाकी रहा आसमाँ,उमीदों से भरा
कैसे सुकूँ आये
किसी जस्बात को......
 
होगी फिर सुबह, और फिर रात होगी
चाँद भी आएगा
और शायद तारे भी
पर वो एक तारा, जो टूटा मेरे लिए
क्या सच कर पायेगा
खाब वो प्यारे भी ......


हर रात ये देखूंगी में, तारो से सजी महफ़िल
और याद करुँगी उसको
जो था मेरा अपना....
शायद फिर कोई तारा, टूट के मुझसे कहदे
आया हु में करने
मुमकिन वो मुश्किल सपना......